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Sunday, September 15, 2013

Dhuan


धुआं

एक धुआं  सा  उठ रहा है दिल में ...
जो कशिस है मेरे दिल में  …
वो आज कहीं दबी जा रही है  …

मेरी नजरें मुझे चुपके से जैसे बताना चाहती हों  ,
की में गुम हुआ जा रहा हूँ खुद में।

इन तनहाइयों में  मेरा मन कहीं साथ ना छोड़ दे ,
इसी फ़िक्र में तेरे साथ जीने की तमन्ना को जगाये जा रहा हूँ दिल में।

और कहीं दूर एक प्यासे को पानी पीता देख ये सवाल है मन में उठ रहा,
 की जो ये प्यास है अधूरी ये कब होगी पूरी।

इसी कश में कश में जिए जा रहा हूँ ,की एक दिन ऐसा भी आयगा जब ये कोहरा छटेगा और आसमान साफ़ हो कर मेरे अरमानों की ओझल होती तस्तरी पर अपनी पानी की बूँदें गिरा कर मुझे फिर तैरने के लिए मजबूर कर देगा।

शामें कई आई है जिंदगी में पर अब सुबह देखने की आस में अरमानों के दिए जलाये जा रहा हूँ दिल में।

वक़्त कुछ रुका रुका सा है,
कदम कुछ थमें थमें से हैं,
न जाने ये कैसी आहट है ,
कोई जैसे राह में खड़ा बुला रहा हो, की अ और इस वक़्त के दरमियाँ  जिले अपने पल को।
वो जहाँ जिस से निकल गए थे दूर हम,

आज फिर अपने आप को वहां खड़ा पाकर एक अजीब सा एहसास हो रहा है,
एक डर है जो पूछ रहा है की कही वक़्त को इसका इल्म न हो जाये।

एक धुआं सा उठ रहा है दिल में ..
जो कशिस है मेरे दिल में ..
वो आज कहीं दबी जा रही है।

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